पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गांव में 60 साल के एक खेतिहर मज़दूर की कल्पना कीजिए। उसका जन्म 1960 के दशक में घर पर हुआ था, और उसने अपने जीवन के हर चुनाव में वोट दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान एक अधिकारी उससे उसकी जन्मतिथि, निवास और नागरिकता का सबूत मांगता है।
उसके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, क्योंकि किसी ने उसका जन्म दर्ज नहीं कराया था। उसे बताया जाता है कि उसका राशन कार्ड निवास का प्रमाण नहीं है। उसका आधार कार्ड – जो कई साल पहले उसके घर के पते पर जारी हुआ था – न उसकी उम्र, न पता, न ही नागरिकता साबित करता है। उसके पास कभी पासपोर्ट नहीं था और उसने स्कूल भी पूरा नहीं किया। वह खाली हाथ राज्य के सामने खड़ा है, और उस पर यह साबित करने का बोझ है कि वह विदेशी नहीं है।
यह राज्य की तीन अपनी बनाई हुई नाकामियों का अनुमानित परिणाम है। इनमें से किसी के लिए भी कोई एक सरकार या पार्टी ज़िम्मेदार नहीं है। यह दशकों की सामूहिक अनदेखी का नतीजा है – हर जन्म को दर्ज करने जैसे गैर-चमकदार, गैर-फैशनेबल कामों की अनदेखी, जिस पर राजनीति ने कभी ध्यान नहीं दिया – जिसके एक के बाद एक आने वाली सरकारों सहित लिए पूरी व्यवस्था ज़िम्मेदार है।
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 से यह अनिवार्य करता है कि हर जन्म 21 दिनों के भीतर पंजीकृत हो। यह राज्य का काम था और दशकों तक ऐसा हुआ नहीं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में भी हाल में 2005-06 में सिर्फ 41% जन्म पंजीकृत थे, और 2000 के दशक के मध्य से पहले भारत में घर पर होने वाले ज़्यादातर जन्म – राष्ट्रीय स्तर पर 39% डिलीवरी – संस्थागत नहीं थीं।
आज राहत की बात है कि 98% नवजातों के जन्म पंजीकृत हो रहे हैं, लेकिन इससे मौजूदा मतदाता सूची में मौजूद वयस्कों के बारे में कुछ पता नहीं चलता।
पंजीकरण आपके हाथ में मौजूद प्रमाण पत्र भी नहीं है – ये कानूनन दो अलग-अलग काम हैं, और दशकों तक दूसरा काम अक्सर होता ही नहीं था। अगर सबसे सख्त राय सही है कि जन्म के समय जारी जन्म प्रमाण पत्र ही जन्म की तारीख का असली सबूत है, तो शायद आठ में से एक मतदाता के पास ही वह होगा। बाकी 85 करोड़ के पास नहीं। ऐसी परीक्षा जो नागरिकों की बहुसंख्या पास ही न कर सकें, वह परीक्षा नहीं है। यह बहिष्कार की मशीन है।
मैं यह आधार के शुरुआती दिनों के अपने अनुभव से कह सकता हूं। मैं यूआईडीएआई का संस्थापक महानिदेशक था। हमने पाया कि बहुत से लोगों को अपनी जन्मतिथि ही नहीं पता थी। हमने इसे “दस्तावेज़ मौजूद होने पर सत्यापित” और “कोई नहीं होने पर घोषित या अनुमानित” के रूप में दर्ज किया। गांवों में ज़्यादातर लोग बाद वाली श्रेणी में थे।
लोग अपनी उम्र उस साल से तय करते थे जिस साल बड़ा अकाल पड़ा था – इसी वजह से बहुत से भारतीयों का जन्मदिन 1 जनवरी होता है: जब सिर्फ साल पता हो तो सिस्टम वही तारीख दे देता है। ऐसे लोगों से सटीक, दस्तावेज़ी जन्मतिथि मांगना कड़ाई नहीं, बहिष्करण है।
हमने कभी नागरिकता का दस्तावेज़ भी नहीं दिया। भारत में कोई नागरिकता कार्ड नहीं है। पासपोर्ट – जो 8% से भी कम भारतीयों के पास है – को जून में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ यात्रा दस्तावेज़ है, नागरिकता का प्रमाण नहीं।
आधार, ख़ुद अपने क़ानून के अनुसार, नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है, और न ही वोटर आईडी या पैन है। नागरिक रजिस्टर बनाने का हर प्रयास विफल रहा है – एमएनआईसी पायलट बंद हो गया, असम एनआरसी ने 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया और कुछ हल नहीं निकला, आखिरकार यह विचार राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में घुल गया – निवासियों और गैर-नागरिकों का रजिस्टर, क्योंकि गृह मंत्रालय ने पाया कि नागरिकता की क्षेत्रीय जांच व्यावहारिक नहीं है। नागरिक से उस स्थिति का सबूत मांगा जाता है जिसे राज्य ने कभी प्रमाणित ही नहीं किया।
और अब हम अपने ही दस्तावेज़ों को नकार रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक याचिका में कहा गया है कि आधार को सिर्फ पहचान के प्रमाण के रूप में माना जाए – उम्र, पता या नागरिकता के नहीं। निवास पर कानून खुद बात साफ कर देता है: एक मतदाता को सामान्यतः निवासी होना चाहिए, और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम कहता है कि घर का मालिक होना इसे साबित नहीं करता और अस्थायी अनुपस्थिति इसे खत्म नहीं करती।
हर दस्तावेज़ जो प्रचलन में है, आंशिक है या अस्वीकृत है- राशन कार्ड खुद कहता है कि यह निवास का प्रमाण नहीं है, दूसरे के नाम का बिजली बिल भी प्रमाण नहीं है, आसानी से फर्जी किया जा सकने वाला किरायानामा भी प्रमाण नहीं है। अकेला आधार कार्ड भौतिक रूप से धारक के पते पर स्पीड पोस्ट के जरिए पहुंचाया गया था – एक जानबूझकर की गई महंगी पसंद जो यह दिखाने के लिए थी कि पत्र उस पते पर पहुंचा – और यही वह दस्तावेज़ है जिसे राज्य अब पते का प्रमाण नहीं मान रहा। हम उस एक पते को नकार रहे हैं जिसके लिए हमने डिलीवरी का कष्ट उठाया था।
इन तीनों नाकामियों को जोड़ दीजिए और नागरिक बेबस है: राज्य न उसकी उम्र मानता है, न निवास, न नागरिकता, और विदेशी अधिनियम अब भी उस पर यह साबित करने का बोझ डालता है कि वह विदेशी नहीं है। कोई भी अधिकारी लगभग किसी भी नागरिक को संदिग्ध अवैध प्रवासी करार दे सकता है, बशर्ते वह ऐसे कागज़ न दे सके जो राज्य ने उसे कभी दिए ही नहीं।
हर रिकॉर्ड को किसी न किसी नाम पर खारिज किया जा सकता है – जिसमें राज्य द्वारा खुद बनाए गए रिकॉर्ड भी शामिल हैं – और इस तरह अपने ही लोगों को पहचानने में वह असमर्थ हो जाता है।
यह निहिलिज़्म है, और यह शासन करने का तरीका नहीं है। किसी ऐसी नाकामी के लिए नागरिक से जवाब मांगना अन्याय है जो उसकी नहीं, व्यवस्था की थी। चुनाव आयोग का एसआईआर ठीक यही अन्याय करोड़ों आम मतदाताओं पर थोप रहा है – एक पुराना, दस्तावेज़-भारी, घर-घर जाकर किया जाने वाला अभियान, जिसे डिजिटल भारत के युग में फिर से शुरू किया गया है ताकि देश की पहले से हल हो चुकी समस्या को सुलझाया जा सके।
हल और अधिक कट्टरता नहीं, व्यावहारिकता है। आधार इस देश में बने सबसे सफल सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स में से एक है – हर निवासी के लिए एक अनूठी डिजिटल पहचान, जिसने कल्याणकारी डिलीवरी को बदला और त्वरित डिजिटलीकरण को बढ़ाया। ईमानदार सवाल आधार बनाम एक सही दस्तावेज़ का नहीं है, बल्कि आधार बनाम वह जो लोगों के पास वास्तव में है।
उम्र के मामले में हमें सिर्फ एक तथ्य चाहिए – क्या व्यक्ति 18 साल या उससे बड़ा है? आधार यह बिना तारीख के बता देता है। चूंकि पांच साल से कम उम्र में बायोमेट्रिक नहीं लिए जाते, इसलिए 2013 या उससे पहले जिनका बायोमेट्रिक लिया गया था, वे सभी कम से कम पांच साल के तो थे ही और अब 18 के हैं। जहां तक निवास का सवाल है, कौन सा दस्तावेज़ पते के प्रमाण के लिए दरवाज़े पर पहुंचाए गए आधार से मज़बूत है, और कितने लोग उससे मज़बूत दस्तावेज़ रखते हैं।
नागरिकता पर, कुछ असली गड़बड़ियों को पहचानने के लिए आधार के डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल होने दीजिए, और गृह मंत्रालय फैसला करे, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है।
भारत ने एक दशक दुनिया में सबसे अच्छी डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा बनाने में बिताया है। अब यह कहना विकृत होगा कि इनमें से कोई भी भरोसे लायक नहीं है – और अधिकारियों को घर-घर जाकर राज्य के कागज़ मांगने भेज देना जो हमने कभी दिए ही नहीं। एक गणतंत्र जो अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लेता है, वह अपने लोगों को बार-बार साबित नहीं करवाता कि वे इसी के हैं। वह उन्हें मानता है। हमारे पास पहले से साधन हैं। हमें उनका इस्तेमाल करना चाहिए।
(यूआईडीएआई के सस्थापक डीजी और मिशन निदेशक रह चुके आरएस शर्मा का लेख इंडियन एक्सप्रेस से साभार। हिंदी अनुवाद संजीव कुमार की फेसबुक वॉल से।)